Friday, 9 January 2009

कर्मिष्ठ भास्कर

कर्मिष्ठ भास्कर

संसारके दूसरे छोर की झोलिमें एक और दिन की प्रकाश संजीवनी
व सोनेसे अलंकृत कर, दबे पाँव ममता से ओतप्रोत आदित्य, चाँद
तारोंके कंडील परवान होती रजनी की श्याम रंग चुनर में टांक
कर उसे सुसज्जित कर देता है और लोरियों के मधुर स्वरों से
हौले हौले थपथपाकर सपनों की दुनिया में रवानाकर देता है
दुनियाके इस छोर अनथक सूर्य अब रात की स्याही का
सेवनकर मधमस्त क्शितिजपर बेसब्रीसे लुकाछुपी करने लगता है


सपनोकी दुनिया में खोये हुए इस पूरब संसारको प्यारसे उठाता है
वह जैसे जैसे परवान होता है वैसे वैसे अपने ज्योति कलशसे चारों दिशामे
मानो उजालेका अर्क अर्पण कर रहाहो धरती माँ को नमन कर रहा हो
मन्दिर की घंटियाँ बजने लगती हैं और हरेक प्राणी नैनोंके पट्ट धीमेसे
खोल नव दिनका स्वागत करता है नए जोश व उमंगसे भर जाते है
जम्हाइयोंका जामा त्याग आलस्य व आरामका दोशाला उतार फेंकते है
और फिर से होंसले का दामन कसके पकड़ एक बार फिर चल पड़ते है


कर्मिष्ठ सूरज जैसे जैसे परवान होता और अम्बर में अपना स्वर्णिम रथ
चलाता है वैसे वैसे पूरे विश्वके इस छोरमें एक नया उल्हास उत्पन्न करता है
हरेक प्राणी अपनी जीवन नैयाको संसार सागरमे फिरसे उतार देता है
मुरझाये फूल खिलखिलाकर कर हँसने लगते हैं, पेड़ मानो नर्त्य करते हैं
पंख पखेरू पेड़ की गोद त्याग नई उमंग से दानेकी खोजमे उड़ने लगते हैं
हरेक प्राणी जीवनकी आपा धापिमें मगन हो व्यस्त हो जाता है हर्षित
कर्मिष्ठ सूर्य धरतीसे सांठ गाँठ किए हौले हौले से दबे दबे पगोंसे


प्रभात फेरी पूर्णकर आकाश गंगासे
सांझ तलक अपना रथ हाँक कर
इस छोर में अपना काम पूर्ण कर
अस्त हो जाता और दूसरे छोर
को दोबारा रौशन करने निकल
पड़ता कमर कसकर अनथक,
अडिग, कर्मिष्ठ!!

-बीना गुप्ता