Sunday, 1 June 2008

घालिब ने ठीक क़हा था

घालिब ने ठीक कहा था
जो आँख से न टपके
वह लहू ही क्या है
ठीक क़हा था

आज एक माँ की आँख से
लहू टपका था
एक पिता ने लहू का
घूंट पीया ठा

जिन्दगी की शाम में वेह लाठी
खोज रहे थे अपने लहू की
कम्भाख्त वोही
धोखा दे गयी

सारी उम्मर की कमाई
मिटटी हो गयी
एक बेबस माँ बाप की निशब्द
जुबान, विरान नेत्र
और काँपते हाथ
गैरों की आंखों में लहू के
आंसू उतार लाये
एक नाशुकरे बेगैरत बेटे की
रुखाई बयान कर गये
आँख से जो ना टपके
वह लहू ही क्या है
आज लहू ही लहू को
लहू के आंसू रुला रहा है
एक बेगैरत बेटा, गैरात्मंद पिता कों
खून के आंसू रुला रहा है
घआलिब ने ठीक कहा था बीना
जो आँख से ना टपके वह
लहू ही क्या है
आजका श्रवण कुमार किधर है
घालिब ने ठीक कहा था
जो आँख स ना टपके
वह लहू ही क्या है

बीना गुप्ता




मीठी मीठी बातें

मीठी मीठी बातें

घर कर ग़यी

कानोंकी सीडिसे

दिल में उतर गयी

ना ना कब हाँ हाँ हो गया

कुछ ख़बर नही

जादूगर की जादूगरी

काम तमाम कर गयी

दुनिया से बेखबर

दीवानगी का यह आलम

बदहवास गली गली

पीया को खोजती रहती

बेरहम हवा के झोंके सा आता

कुछ पल प्रेम क्रीडा कर

हवा हो जाता, वह हताश

बेबस, राह तकती कब आएगा

फिर रगों में हरकत होगी

और लहू रवां होंगा

सम्मोहन ऐसा तीव्रः

छुटे ही छुटता

मीठी मीठी बातें

ऐसे घर कर गयी

कानो की सीडी से

दिल में उतर गयी

मीठी मीठी बातों से बचना

ज़रा, दुनिया में है जादू बहरा

बीना गुप्ता

में और में तन्हाई

मैं और मेरी तन्हाई
आज मिल बैठे दोनों
कुछ कही कुछ सूनी
चन्द भूली बिसरी यादें
उमड़ पड़ी जहन मैं
भावुकता ने प्रलय मचाई
और सय्लाब दिल को ले डूबा
कुछ अनकही बातें उभरी
कुछ गिले शिकवे कहे
प्यार को ठुकराने का सबब पुछा
बरसों का दबा गुबार फूट पडा
फ़र्ज़ और दिल की ज़ंग मैं
दिल ही हारा करते हें हमेशा
जिंदा लाश बनकर डोली में
कारवां रवां हुआ था कभी
फूलों की बरखा हुई थी
और मन ने रोकर कहा था
मेरी मजार पे फूल क्यों चढाते हो
दबे हुए को और क्यों दबाते हों
शोरगुल में दिल की हुक ठंडी पड़ी
मुर्दा चाहत, बेरुखी हँसी
बदहवास जिदगी का भोझ लादे
कारवां गुजर गया और हम
इस गुबार में गुम हों गये
डोली में महज शरीर था
आत्मा पीछे लुप्त हो गए थी
प्यार में विलीन सदा
के लिए येकामेक

बीना गुप्ता