घालिब ने ठीक कहा था
जो आँख से न टपके
वह लहू ही क्या है
ठीक क़हा था
आज एक माँ की आँख से
लहू टपका था
एक पिता ने लहू का
घूंट पीया ठा
जिन्दगी की शाम में वेह लाठी
खोज रहे थे अपने लहू की
कम्भाख्त वोही
धोखा दे गयी
सारी उम्मर की कमाई
मिटटी हो गयी
एक बेबस माँ बाप की निशब्द
जुबान, विरान नेत्र
और काँपते हाथ
गैरों की आंखों में लहू के
आंसू उतार लाये
एक नाशुकरे बेगैरत बेटे की
रुखाई बयान कर गये
आँख से जो ना टपके
वह लहू ही क्या है
आज लहू ही लहू को
लहू के आंसू रुला रहा है
एक बेगैरत बेटा, गैरात्मंद पिता कों
खून के आंसू रुला रहा है
घआलिब ने ठीक कहा था बीना
जो आँख से ना टपके वह
लहू ही क्या है
आजका श्रवण कुमार किधर है
घालिब ने ठीक कहा था
जो आँख स ना टपके
वह लहू ही क्या है
बीना गुप्ता
Sunday, 1 June 2008
मीठी मीठी बातें
मीठी मीठी बातें
घर कर ग़यी
कानोंकी सीडिसे
दिल में उतर गयी
ना ना कब हाँ हाँ हो गया
कुछ ख़बर नही
जादूगर की जादूगरी
काम तमाम कर गयी
दुनिया से बेखबर
दीवानगी का यह आलम
बदहवास गली गली
पीया को खोजती रहती
बेरहम हवा के झोंके सा आता
कुछ पल प्रेम क्रीडा कर
हवा हो जाता, वह हताश
बेबस, राह तकती कब आएगा
फिर रगों में हरकत होगी
और लहू रवां होंगा
सम्मोहन ऐसा तीव्रः
छुटे ही छुटता
मीठी मीठी बातें
ऐसे घर कर गयी
कानो की सीडी से
दिल में उतर गयी
मीठी मीठी बातों से बचना
ज़रा, दुनिया में है जादू बहरा
बीना गुप्ता
में और में तन्हाई
मैं और मेरी तन्हाई
आज मिल बैठे दोनों
कुछ कही कुछ सूनी
चन्द भूली बिसरी यादें
उमड़ पड़ी जहन मैं
भावुकता ने प्रलय मचाई
और सय्लाब दिल को ले डूबा
कुछ अनकही बातें उभरी
कुछ गिले शिकवे कहे
प्यार को ठुकराने का सबब पुछा
बरसों का दबा गुबार फूट पडा
फ़र्ज़ और दिल की ज़ंग मैं
दिल ही हारा करते हें हमेशा
जिंदा लाश बनकर डोली में
कारवां रवां हुआ था कभी
फूलों की बरखा हुई थी
और मन ने रोकर कहा था
मेरी मजार पे फूल क्यों चढाते हो
दबे हुए को और क्यों दबाते हों
शोरगुल में दिल की हुक ठंडी पड़ी
मुर्दा चाहत, बेरुखी हँसी
बदहवास जिदगी का भोझ लादे
कारवां गुजर गया और हम
इस गुबार में गुम हों गये
डोली में महज शरीर था
आत्मा पीछे लुप्त हो गए थी
प्यार में विलीन सदा
के लिए येकामेक
बीना गुप्ता
आज मिल बैठे दोनों
कुछ कही कुछ सूनी
चन्द भूली बिसरी यादें
उमड़ पड़ी जहन मैं
भावुकता ने प्रलय मचाई
और सय्लाब दिल को ले डूबा
कुछ अनकही बातें उभरी
कुछ गिले शिकवे कहे
प्यार को ठुकराने का सबब पुछा
बरसों का दबा गुबार फूट पडा
फ़र्ज़ और दिल की ज़ंग मैं
दिल ही हारा करते हें हमेशा
जिंदा लाश बनकर डोली में
कारवां रवां हुआ था कभी
फूलों की बरखा हुई थी
और मन ने रोकर कहा था
मेरी मजार पे फूल क्यों चढाते हो
दबे हुए को और क्यों दबाते हों
शोरगुल में दिल की हुक ठंडी पड़ी
मुर्दा चाहत, बेरुखी हँसी
बदहवास जिदगी का भोझ लादे
कारवां गुजर गया और हम
इस गुबार में गुम हों गये
डोली में महज शरीर था
आत्मा पीछे लुप्त हो गए थी
प्यार में विलीन सदा
के लिए येकामेक
बीना गुप्ता
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