Wednesday, 13 May 2009

ज़ख्म

ज़ख्म

ज़ख्मों को हरा रखते हैं
अतीत के सायों से घिरा रखते हैं

अश्रुओं से सींचते हैं
आहों से हवा करते हैं

ग्रीष्म की गरम लू ज़ख्म
झुलसाए नहीं खुद से ताकीद करते हैं

दिल पर पड़ी दरारों के झरोखों से
अपनी बर्बादी का जनाज़ा देखा करते हैं

कुछ सूखे अश्क, कुछ नमकीन लकीरें
कुछ तड़पन कुछ झिलाहट कुछ छटपटाहट

सभी सामान हैं अतीत के संदूक में छिपाया
खट्टी मीठी बातें तिल तिल मरना जीना

आम अलौकिक बेमतलब हकीकत
सभी को तवोज्जो है बराबर आंकी

ज़ख्मों को हरा रखते हैं
अतीत के सायों से घिरा रखते हैं

ज़ख्म तो हैं अपने सच्चे साथी
वजूद में शामिल बेमुल्य रतन

इसीलिए सुबह सेहर करते हैं जतन
कुरेद कुरेद नवनित जीवित करते हैं

अश्रुओं से सींचते हैं
आहों से पंखा करते हैं

ज़ख्मों को हरा रखते हैं
अतीत के सायों से घिरा रखते हैं

जब सिसकियाँ आह बन होठों तक आ जाती हैं
उनको दांतों तले भीच कर वापिस लौटा देते हैं


ग़मों से घबराना कैसा यह तो सच्चे साथी लगते हैं
अपने तो खुशनुमा पल जहन पर घाव कर चले गए हैं


टूटे दिल का हाल फिर भी भला सा लगता है
दगा नहीं देगा जो खुद लुटा हो वो भला क्या ले जाएगा

अब तोः येही सामान जयेएगा संग
सब कुछ छोड़ इसके संग हो लेंगे हम

जब हमारी कब्र से सिसकियाँ उठें
तो गम ना करना चौंकना नहीं

ज़ख्मों को हरा रखते हैं
अतीत के सायों से घिरा रखते हैं

अश्रुओं से सींचते हैं
आहों से हवा करते हैं

दिल पर पड़ी दरारों के झरोखों से
अपनी बर्बादी का जनाज़ा देखा करते हैं

ज़ख्मों को हरा रखते हैं
अतीत के सायों से घिरा रखते हैं



--बीना गुप्ता

Thursday, 7 May 2009

आज

आज

आज बालगोपाल रिझाना है
कुछ भी समय नहीं गवाना है

भोर भये जग सज संवर जाना है
मटकी कमरिया यमुना जल लाना है

रसोई चौक पुराई कर दही मंथना है
माखन मिसरी प्यारे को अर्पण करना है

आँचल भर ताजे फूल छाँट हार पिरोना है
चन्दन घिस केसर तिलक संवारेको लगाना है

रोम रोम रत गोविन्दा भज सवयं को समर्पना है
आज रूठे को मानना और रिझाना स्वयं गवाना है

रीती रिवाज पूजा विधि मन्त्र तंत्र यंत्र जानू नहीं
अपनी प्रीति सदियों पुरानी उसी को मानु मैं सही

माँ बेटे का रिश्ता होता सबसे ज्यादा मन लुभावना
माखन चोर रिझाने की मन मेरा करे है सम्भावना

आज कान्हा को रिझाना है
कुछ भी समय नहीं गवाना है


रोम रोम रत गोविन्दा भज सवयं समर्पना है
आज रूठे को मानना रिझाना स्वयं गवाना है

आज मनमोहना को रिझाना है
कुछ भी समय नहीं गवाना है

अहेम झूठी मान मर्यादा शानो शौकत तजना है
कृष्ण चरण धुल मस्तक रज अपने को तजना है

आज कन्हैया को रिझाना है
कुछ भी समय नहीं गवाना है

भोर भये जग सज संवर जाना है
मटकी कमरिया यमुना जल लाना है

भोर भये जग सज संवर जाना है
मटकी कमरिया यमुना जल लाना है

मैं योशोदा वो कान्हा हमारा रिश्ता मन लुभावना
माखन चोर रिझाने की मन मेरा आज करे कामना

आज बालगोपाल रिझाना है
कुछ भी समय नहीं गवाना है

--बीना गुप्ता

Saturday, 2 May 2009

umang

उमंग

अंग अंग पुलकित
रोम रोम हर्षित
रक्तचाप का उठता
उफान करे मूर्छित

दुनिया है रंगीन
मन नहीं गमगीन
दिल में है तस्कीन
जीवन है आफरीन

सभी ओड़े हैं आवरण
इन्द्रधनुषी सतरंगे
स्याह साए सुबह शाम
अब मुख छिपाए हत्भगे

दीपावली सी जगमग
उमंग लहराए रगरग
नयी कलि आंगन खिली
ख़ुशी से है झोली भरी


कन्ह्ना ने अनकहा
अरमान सुन लिया
दिल को डेर सारी
खुशियों से भर दिया


चाल मैं है उमंग
जीवन मैं है तरंग
कोई गिले नहीं संग
मन उड़े अम्बर पतंग


--बीना गुप्ता

Friday, 9 January 2009

कर्मिष्ठ भास्कर

कर्मिष्ठ भास्कर

संसारके दूसरे छोर की झोलिमें एक और दिन की प्रकाश संजीवनी
व सोनेसे अलंकृत कर, दबे पाँव ममता से ओतप्रोत आदित्य, चाँद
तारोंके कंडील परवान होती रजनी की श्याम रंग चुनर में टांक
कर उसे सुसज्जित कर देता है और लोरियों के मधुर स्वरों से
हौले हौले थपथपाकर सपनों की दुनिया में रवानाकर देता है
दुनियाके इस छोर अनथक सूर्य अब रात की स्याही का
सेवनकर मधमस्त क्शितिजपर बेसब्रीसे लुकाछुपी करने लगता है


सपनोकी दुनिया में खोये हुए इस पूरब संसारको प्यारसे उठाता है
वह जैसे जैसे परवान होता है वैसे वैसे अपने ज्योति कलशसे चारों दिशामे
मानो उजालेका अर्क अर्पण कर रहाहो धरती माँ को नमन कर रहा हो
मन्दिर की घंटियाँ बजने लगती हैं और हरेक प्राणी नैनोंके पट्ट धीमेसे
खोल नव दिनका स्वागत करता है नए जोश व उमंगसे भर जाते है
जम्हाइयोंका जामा त्याग आलस्य व आरामका दोशाला उतार फेंकते है
और फिर से होंसले का दामन कसके पकड़ एक बार फिर चल पड़ते है


कर्मिष्ठ सूरज जैसे जैसे परवान होता और अम्बर में अपना स्वर्णिम रथ
चलाता है वैसे वैसे पूरे विश्वके इस छोरमें एक नया उल्हास उत्पन्न करता है
हरेक प्राणी अपनी जीवन नैयाको संसार सागरमे फिरसे उतार देता है
मुरझाये फूल खिलखिलाकर कर हँसने लगते हैं, पेड़ मानो नर्त्य करते हैं
पंख पखेरू पेड़ की गोद त्याग नई उमंग से दानेकी खोजमे उड़ने लगते हैं
हरेक प्राणी जीवनकी आपा धापिमें मगन हो व्यस्त हो जाता है हर्षित
कर्मिष्ठ सूर्य धरतीसे सांठ गाँठ किए हौले हौले से दबे दबे पगोंसे


प्रभात फेरी पूर्णकर आकाश गंगासे
सांझ तलक अपना रथ हाँक कर
इस छोर में अपना काम पूर्ण कर
अस्त हो जाता और दूसरे छोर
को दोबारा रौशन करने निकल
पड़ता कमर कसकर अनथक,
अडिग, कर्मिष्ठ!!

-बीना गुप्ता

Sunday, 10 August 2008

ओ क्रष्ण

ओ कृष्ण ओ कृष्ण
जल्दी आओ ना
मुझे ऐसे सताओ न
कबसे खड़ी आस लगा
अब तो झलक दिखा
न तड़पा तरसा
श्याम हो चली है श्याम्मा
अब तो दरस दिखा
तेरी सूरत नजर आयी न
मन मेरा बोखलाए रोये है
ऐसे मुझे सताओ न
अओना जल्दी आजाओ न
मेरा दिल टूट रहा है
साँस छुट रहा है
धड़कन रूठ रही है
आस तोडो न
रिश्ता बनाये रखो न
रोम रोम कांप रहा है
जिव्हा एक ही नाम दोहराये है
आओ न माँ को सताओ न
जल्दी चले आओ न
माखन मिसरी लिए खड़ी
हालत बिगड़ी बिखरी
होश नही भूली बिसर
राह तेरी तक रही अटल
अब और न तू मचल
तेरे सिवा जोर किसपे है
आओ न माँ को सताओ न
चलो जल्दी लौट आओ न

पग घुंघरू बोल उठे
मधुर स्वर गूंज उठे
मनमोर नाच उठा
पपीहा गीत गाने लगा
मेरा कान्हा आ गया
जोर से लिपट गया
भाव विभोर अश्रु बहे
उसने माके अश्रु पोंछे
माँ ने
उसके आंसू
कान्हा के चरण धुलने लगे
वातवरण हरा भरा होगाया
पता पत्ता खिल उठा
मण आबाद हुआ
मेरा कान्हा आ गया
और आभास हुआ
हम दो थे ही नही
वो वो ण रहा
में उसमे विलीन
वोह मुझमे
सब एक रंग
हो गए
क्रिश्न्न्मयेह
श्री क्रष्ण शरणं मम्




Friday, 1 August 2008

वर्तमान विडंबना

वर्तमान विडम्बना

चिर काल से चीर हरण कराये नारी

दमन से सदा दामन न बचा सके नारी

अब अध् ढके वजूद की नुमाइश करे नारी

स्वः अस्तित्व कों स्व नाचीज़ बनाए नारी

अस्मत सरे बाज़ार बिकाए अबला नारी

दरो दीवार की शोभा स्वयम बढाये नारी

सृजनहारा कोख का मूल्य लग्गाये नारी

अपने ही हाथों अपने को मिटाए नारी

पोशंकर्ता शोषित हो हथ्भागी कहलाये'

देवियाँ लक्षी सरस्वती दुर्गा पूजित जहाँ

पुतलियों के किवाड मूंदे आँखे चुराई नारी

किस से शिकायत करे जब ख़ुद घर फूके नारी

कुछ मर्जी, कुछ मजबूरी कुछ हालत

खोखला ताकतहीन बनाए नारी

भाग्य की विडंबना देखो पाप हरिणी पावन गंगा

स्व स्वछन्द निर्मल होने को तरसे तिलतिल

सफर

कुछ गुलाबी सुखी पंखुडियां
कुछ बोल, भूले बिसरे गीतों के
कुछ खिलखिलाती हँसी
कुछ देखे से, जाने पहचाने पल
एक अतितका चेहरा रोशन हुआ
बिसरी यादों के जालों के झूमर चीर
पुराणी यादों का कारवां रवां हुआ
झरोखों में कांपते दिए जगमगा उठे
बचपन दस्तक किए ऊँगली पकड़े
ले चला जानी पहचानी राहों में
मन खुशी से झूम उठा
निराशा का आवरण उतार
आशा धरे
नयी उमंग
में रोम रोम रम
चल पडा
उत्साहित
प्रसन्न