Friday, 1 August 2008

वर्तमान विडंबना

वर्तमान विडम्बना

चिर काल से चीर हरण कराये नारी

दमन से सदा दामन न बचा सके नारी

अब अध् ढके वजूद की नुमाइश करे नारी

स्वः अस्तित्व कों स्व नाचीज़ बनाए नारी

अस्मत सरे बाज़ार बिकाए अबला नारी

दरो दीवार की शोभा स्वयम बढाये नारी

सृजनहारा कोख का मूल्य लग्गाये नारी

अपने ही हाथों अपने को मिटाए नारी

पोशंकर्ता शोषित हो हथ्भागी कहलाये'

देवियाँ लक्षी सरस्वती दुर्गा पूजित जहाँ

पुतलियों के किवाड मूंदे आँखे चुराई नारी

किस से शिकायत करे जब ख़ुद घर फूके नारी

कुछ मर्जी, कुछ मजबूरी कुछ हालत

खोखला ताकतहीन बनाए नारी

भाग्य की विडंबना देखो पाप हरिणी पावन गंगा

स्व स्वछन्द निर्मल होने को तरसे तिलतिल

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