घालिब ने ठीक कहा था
जो आँख से न टपके
वह लहू ही क्या है
ठीक क़हा था
आज एक माँ की आँख से
लहू टपका था
एक पिता ने लहू का
घूंट पीया ठा
जिन्दगी की शाम में वेह लाठी
खोज रहे थे अपने लहू की
कम्भाख्त वोही
धोखा दे गयी
सारी उम्मर की कमाई
मिटटी हो गयी
एक बेबस माँ बाप की निशब्द
जुबान, विरान नेत्र
और काँपते हाथ
गैरों की आंखों में लहू के
आंसू उतार लाये
एक नाशुकरे बेगैरत बेटे की
रुखाई बयान कर गये
आँख से जो ना टपके
वह लहू ही क्या है
आज लहू ही लहू को
लहू के आंसू रुला रहा है
एक बेगैरत बेटा, गैरात्मंद पिता कों
खून के आंसू रुला रहा है
घआलिब ने ठीक कहा था बीना
जो आँख से ना टपके वह
लहू ही क्या है
आजका श्रवण कुमार किधर है
घालिब ने ठीक कहा था
जो आँख स ना टपके
वह लहू ही क्या है
बीना गुप्ता
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