Sunday, 1 June 2008

में और में तन्हाई

मैं और मेरी तन्हाई
आज मिल बैठे दोनों
कुछ कही कुछ सूनी
चन्द भूली बिसरी यादें
उमड़ पड़ी जहन मैं
भावुकता ने प्रलय मचाई
और सय्लाब दिल को ले डूबा
कुछ अनकही बातें उभरी
कुछ गिले शिकवे कहे
प्यार को ठुकराने का सबब पुछा
बरसों का दबा गुबार फूट पडा
फ़र्ज़ और दिल की ज़ंग मैं
दिल ही हारा करते हें हमेशा
जिंदा लाश बनकर डोली में
कारवां रवां हुआ था कभी
फूलों की बरखा हुई थी
और मन ने रोकर कहा था
मेरी मजार पे फूल क्यों चढाते हो
दबे हुए को और क्यों दबाते हों
शोरगुल में दिल की हुक ठंडी पड़ी
मुर्दा चाहत, बेरुखी हँसी
बदहवास जिदगी का भोझ लादे
कारवां गुजर गया और हम
इस गुबार में गुम हों गये
डोली में महज शरीर था
आत्मा पीछे लुप्त हो गए थी
प्यार में विलीन सदा
के लिए येकामेक

बीना गुप्ता






















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